अनुपमा
'अनुपमा जी, आपके दोनों बच्चे बाहर जा बसे और आप दोनों पति-पत्नी यहां अकेले?' कुछ संकोच के साथ मैंने पूछा,'कैसा लगता है?' मेरे मनोभावों के विपरीत चहकती हुई वे बोलीं,' अच्छा, बहुत अच्छा लगता है। सच पूछाे तो, इन परिस्थितियों में हम दोनों बहुत सारे महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। मैं यहां पर अपना गेस्टहाउस चलाते हुए समाज सेवा के कार्य में भी लगी हुई हूं।'
उन्होंने कहना जारी रखा,' मेरे एक बेटा और एक बेटी थोड़ी न है..' अनाथालय के बच्चों की तरफ़ प्यार भरी निग़ाहें डालते हुए बोलीं,'अगर मेरे बच्चे यहां होते, तो क्या मैं इतने बच्चों की मां बन पाती। फिर गेस्ट हाउस से इतनी इनकम हो ही जाती है कि चाहे हर महीने विदेश घूमो। कोई समस्या नहीं। वैसे भी मैं साल में तीन बार अलग-अलग देशांे की सैर भी करती हूं और दो महीने अपने बच्चों के साथ वक़्त भी बिताती हूं। इस प्रकार के निर्णय से बच्चों का कॅरियर भी बेहतर बनता है और अपना आत्मसम्मान भी ज़िंदा रहता है।'
भौचक्की-सी मैं उनकी बातें सुन रही थी। तभी वे बोलीं, 'एक बात और हम अपने स्वास्थ्य के साथ कभी समझौता नहीं करते। सुबह-सवेरे पैदल सैर पर निकल जाते हैं और फिर घर पर आकर योग व प्राणायाम अवश्य करते हैं।'
उस क्षण मुझे अपनी संकुचित मानसिकता पर शर्म आ रही थी परंतु इतना अवश्य था कि मैंने एक नई तरह से जीवन का आकलन करना सीख लिया था।
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