करेला
ये मुझे हनी कहते हैं और मैं इन्हें करेला। यूं तो पत्नी को हनी, स्वीटी कहना आम बात है पर ये मुझे जानबूझकर कहते हैं क्योंकि मैं किसी का भी मन नहीं दुखाना चाहती। कई बार मैं अपने इसी स्वभाव के कारण ग़लती न होते हुए भी सुन लेती हूं। लेकिन मेरे स्वभाव के बिल्कुल विपरीत ये हैं। ये जानबूझकर किसी को कुछ ग़लत नहीं कहते और न ही सुन सकते हैं। ज़ाहिर है इनसे सभी बिचकते है क्योंकि न जाने ये कब किस बात पर टोक दें या सुना दें।
ये रिटायर हो चुके हैं, सो रोज़ सुबह हम चाय, आंगन में बैठ कर ही सुकून से पीते हैं। आंगन में तुलसी जी, कुछ गुलाब, गुड़हल व गेंदे के पौधे, एक चांदनी का नन्हा वृक्ष व सहजन की फलियों का बड़ा-सा पेड़ है। इन पेड़-पौधों की बदौलत हमें गौरेया, कौआ, कबूतर व गिलहरियों का सान्निध्य मिल जाता है और मैं रोज़ ही याद से दाना-पानी भी इन नन्हे मित्रों के लिए आंगन में रखती हूं। कुछ दिनों से हम देख रहे थे कि कौए की एक जोड़ी सहजन की फली के पेड़ पर अपना घोंसला बनाने की जुगत में हैं।
एक दिन सुबह हम आंगन में चाय पीने आए तो पाया कि कौए के जोड़े में से एक आंगन में मृत पड़ा था व दूसरा पेड़ पर बैठ कांव-कांव चिल्ला रहा है। इन्होंने मृत कागा को किसी तरह लकड़ी के टुकड़े से ठेल कर एक बड़े से लिफ़ाफ़े में रखा व गली की कचरा पेटी में डाल अाए। हम यह करते हुए कुछ डर भी रहे थे क्योंकि सुना है कि कौआ नाराज़ हो जाए तो चोंच मारने लगता है, मगर दूसरा कौआ पेड़ पर बैठा-बैठा बस चिल्लाता रहा।
मैंने सफ़ाई की दृष्टि से पानी में दवा डाल कर उस जगह पर छींट दिया। मैं कुछ उदास हो गई, हमारी चाय इस सारे उपक्रम में न जाने कब ठंडी हो गई थी। हम दोनों के मन में कुछ विषाद था, पर मर्द कठोर होते हैं सो कुछ देर बाद ये बोले, 'अरे चाय रह गई अपनी, चलो चाय तो बनाओ।'
'चाय? हां बनाती हूं।' कहकर मैंने फिर चाय बनाई और आंगन में ले आई। ये अख़बार में व्यस्त हो गए थे। मैंने रोज़ की तरह आंगन में दाने डाले व पानी भी रखा। ये चाय-बिस्किट खाने लगे मगर आज चाय मेरे गले के नीचे नहीं उतर रही थी। तभी मैंने देखा कि पक्षी दाना चुग रहे है और वह कौआ एक डाल पर बैठ कहीं से लाई रोटी का टुकड़ा पंजे में दबा कर मज़े में खा रहा है।
'तुम सब मर्द एक जैसे होते हो' मैंने कहा।
'क्यों?' इन्होंने दो पल को पेपर से नज़रें हटाकर मुझे देखते हुए पूछा।
'देखो बीवी मर गई है और ये कौआ मजे़ से रोटी खा रहा है ।' मैंने दुखी स्वर में कहा।
ये कुछ नहीं बोले व फिर अख़बार में डूब गए। मन उद्विग्न था सो मैंने कुछ ग़ुस्से से फिर कहा, 'सच कहा तो कैसे अख़बार के पीछे छिप गए आप।'
'अब जाने दो ना' ये बोले।
'क्यों जाने दो? मुझे पता है कि किसी दिन मैं चली जाऊंगी तो तुम भी उस कौए की तरह मज़े से खाना खाओगे।' मैंने गु़स्से में कहा।
वैसे मैं सहसा इनसे या किसी से भी बहस नहीं करती मगर आज मन सचमुच बेहद ख़राब हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना बिछड़ गया हो।
ये शांत स्वर में बोले, 'सारे मर्द कठोर होते हैं यह शायद सही हो, पर ये बचा हुआ कौआ नर है या मादा न तुम जानती हो न मैं। दूसरी बात, दो साल पहले मेरी मां नहीं रहीं व पिछले साल तुम्हारी मांजी का भी स्वर्गवास हो गया। मुझे अच्छी तरह याद है कि दोनों ही बार जब अंतिम संस्कार कर हम मुक्तिधाम से घर लौटे तो हमारे नहाने के बाद मित्रों-पड़ोसियों ने हमें भोजन करवाया था। हम इंसान होकर भी एक दिन भूखे नहीं रह सके फिर ये तो नन्हे पंछी हैं।'
मुझे एक पल के लिए इन पर बहुत गु़स्सा आया। देख रहे हैं कि मैं दुखी हूं तो मुझे समझाते या बहलाते, पर नहीं, सच बोलना जैसे बहुत ज़रूरी है, हर बार। सब करेला इसीलिए तो कहते हैं इन्हें।
फिर मुझे सहसा इन पर प्यार उमड़ आया क्योंकि जिस प्रकार करेला कड़वा होकर भी स्वास्थ्यप्रद होता है वैसे ही ये कड़वा बोलते हैं मगर सच ही तो बोलते हैं। फिर मैं जानती हूं कि करेले-सी जु़बान वाले पति दिल के बुरे नहीं हैं और किसी का बुरा भी नहीं चाहते।
लघु कथा  : राजेन्द्र वामन काटदरे
ये रिटायर हो चुके हैं, सो रोज़ सुबह हम चाय, आंगन में बैठ कर ही सुकून से पीते हैं। आंगन में तुलसी जी, कुछ गुलाब, गुड़हल व गेंदे के पौधे, एक चांदनी का नन्हा वृक्ष व सहजन की फलियों का बड़ा-सा पेड़ है। इन पेड़-पौधों की बदौलत हमें गौरेया, कौआ, कबूतर व गिलहरियों का सान्निध्य मिल जाता है और मैं रोज़ ही याद से दाना-पानी भी इन नन्हे मित्रों के लिए आंगन में रखती हूं। कुछ दिनों से हम देख रहे थे कि कौए की एक जोड़ी सहजन की फली के पेड़ पर अपना घोंसला बनाने की जुगत में हैं।
एक दिन सुबह हम आंगन में चाय पीने आए तो पाया कि कौए के जोड़े में से एक आंगन में मृत पड़ा था व दूसरा पेड़ पर बैठ कांव-कांव चिल्ला रहा है। इन्होंने मृत कागा को किसी तरह लकड़ी के टुकड़े से ठेल कर एक बड़े से लिफ़ाफ़े में रखा व गली की कचरा पेटी में डाल अाए। हम यह करते हुए कुछ डर भी रहे थे क्योंकि सुना है कि कौआ नाराज़ हो जाए तो चोंच मारने लगता है, मगर दूसरा कौआ पेड़ पर बैठा-बैठा बस चिल्लाता रहा।
मैंने सफ़ाई की दृष्टि से पानी में दवा डाल कर उस जगह पर छींट दिया। मैं कुछ उदास हो गई, हमारी चाय इस सारे उपक्रम में न जाने कब ठंडी हो गई थी। हम दोनों के मन में कुछ विषाद था, पर मर्द कठोर होते हैं सो कुछ देर बाद ये बोले, 'अरे चाय रह गई अपनी, चलो चाय तो बनाओ।'
'चाय? हां बनाती हूं।' कहकर मैंने फिर चाय बनाई और आंगन में ले आई। ये अख़बार में व्यस्त हो गए थे। मैंने रोज़ की तरह आंगन में दाने डाले व पानी भी रखा। ये चाय-बिस्किट खाने लगे मगर आज चाय मेरे गले के नीचे नहीं उतर रही थी। तभी मैंने देखा कि पक्षी दाना चुग रहे है और वह कौआ एक डाल पर बैठ कहीं से लाई रोटी का टुकड़ा पंजे में दबा कर मज़े में खा रहा है।
'तुम सब मर्द एक जैसे होते हो' मैंने कहा।
'क्यों?' इन्होंने दो पल को पेपर से नज़रें हटाकर मुझे देखते हुए पूछा।
'देखो बीवी मर गई है और ये कौआ मजे़ से रोटी खा रहा है ।' मैंने दुखी स्वर में कहा।
ये कुछ नहीं बोले व फिर अख़बार में डूब गए। मन उद्विग्न था सो मैंने कुछ ग़ुस्से से फिर कहा, 'सच कहा तो कैसे अख़बार के पीछे छिप गए आप।'
'अब जाने दो ना' ये बोले।
'क्यों जाने दो? मुझे पता है कि किसी दिन मैं चली जाऊंगी तो तुम भी उस कौए की तरह मज़े से खाना खाओगे।' मैंने गु़स्से में कहा।
वैसे मैं सहसा इनसे या किसी से भी बहस नहीं करती मगर आज मन सचमुच बेहद ख़राब हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना बिछड़ गया हो।
ये शांत स्वर में बोले, 'सारे मर्द कठोर होते हैं यह शायद सही हो, पर ये बचा हुआ कौआ नर है या मादा न तुम जानती हो न मैं। दूसरी बात, दो साल पहले मेरी मां नहीं रहीं व पिछले साल तुम्हारी मांजी का भी स्वर्गवास हो गया। मुझे अच्छी तरह याद है कि दोनों ही बार जब अंतिम संस्कार कर हम मुक्तिधाम से घर लौटे तो हमारे नहाने के बाद मित्रों-पड़ोसियों ने हमें भोजन करवाया था। हम इंसान होकर भी एक दिन भूखे नहीं रह सके फिर ये तो नन्हे पंछी हैं।'
मुझे एक पल के लिए इन पर बहुत गु़स्सा आया। देख रहे हैं कि मैं दुखी हूं तो मुझे समझाते या बहलाते, पर नहीं, सच बोलना जैसे बहुत ज़रूरी है, हर बार। सब करेला इसीलिए तो कहते हैं इन्हें।
फिर मुझे सहसा इन पर प्यार उमड़ आया क्योंकि जिस प्रकार करेला कड़वा होकर भी स्वास्थ्यप्रद होता है वैसे ही ये कड़वा बोलते हैं मगर सच ही तो बोलते हैं। फिर मैं जानती हूं कि करेले-सी जु़बान वाले पति दिल के बुरे नहीं हैं और किसी का बुरा भी नहीं चाहते।
लघु कथा  : राजेन्द्र वामन काटदरे
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